Saturday, 10 March 2018

'रोज़ाना इस्तेमाल' - एॅलिस वॉकर की कहानी 'Everyday Use' का हिन्दी अनुवाद

Image result for Alice Walkerएॅलिस वॉकर - उपन्यास, कविता, कहानी व निबन्ध लेखन, राजनीतिक    ऐक्टिविस्ट। ९ फ़रवरी १९४४, जॉर्जिया, संयुक्त राज्य अमरीका में जन्म । 

अफ़्रो-अमरीकी अनुभव विशेषकर महिलाओं के संघर्ष पर लेखन ।            

'द कलर पर्पल' ( उपन्यास) को १९८३ में पुलित्ज़र एवं नेशनल बुक पुरस्कार, 'द किण्ड्रेड स्पिरिट्स' (कहानी) को ओ. हेनरी कथा- पुरस्कार ।                

                   

रोज़ाना इस्तेमाल

उसका इन्तज़ार मैं अहाते में करूँगी जिसे कल दोपहर मैंने और मैगी ने इतना साफ़ और लहरदार बना दिया है। आम तौर पर लोग जितना समझते हैं उससे कहीं ज़्यादा आरामदेह होता है ऐसा अहाता। बैठक के विस्तार जैसा। सख्त मिट्टी को बुहार फ़र्श सा चमका दिया जाए ओर छोटे-छोटे आड़े-तिरछे खाँचों में किनारों की बारीक बालू की पाँत बना दी जाए तो कोई भी यहाँ आ कर बैठ सकता है, उस बयार के इन्तज़ार में जो घर के भीतर कभी नहीं आती। 
                                                                                                                                        
बोदी और घरेलू सी मैगी तब तक घबराई-घबराई रहेगी जब तक बड़ी बहन चली न जाए। बाँहों और टाँगों पर पड़े जले के निशानों पर शर्मिन्दा, कोनों में खड़ी, निराश, कुछ ईर्ष्या, कुछ श्रद्धा की नज़रों से अपनी बहन को ताकती। उसका खयाल है कि उसकी बहन ने जीवन को सदा से एक हाथ की मुट्ठी में थामा हुआ है, कि 'ना' वह शब्द है जिसे बहन ने दुनिया से कहना कभी सीखा ही नहीं।  
                                                                                             
ऐसे टी.वी. शो तो आपने देखे ही होंगे जिसमें 'कामयाबी' हासिल कर चुकी बेटी का सामना, आश्चर्य के तौर पर, पीछे से गिरते पड़ते आते उसके माँ-बाप के के साथ कराया जाता है। ( बेहद सुखकारी आश्चर्य! आश्चर्य कि बेटी और माँ-बाप अगर एकदूसरे को बुरा-भला कहने, एकदूसरे की लानत-मलामत करने ही शो पर आए हों तो क्या करेंगे शो वाले?) टी.वी. पर माँ-बेटी गले मिलतीं हैं, एकदूसरे को देख मुस्कुराती हैं, माँ-बाप कभी-कभी रो भी पड़ते हैं। बेटी उन्हें बाँहों में भर लेती है और मेज़ पर आगे झुक कर बताती है कि कैसे वह उनकी मदद के बिना कभी कामयाब नहीं हो सकती थी। मैने भी देख रक्खे हैं ये शो।
 
कभी-कभी सपना देखती हूँ कि मैं और डी ऐसे ही एक टी.वी. कार्यक्रम अचानक आमने-सामने ले आए गए हैं। एक गद्देदार लिमूज़िन गाड़ी में मुझे कई लोगों से भरे एक रोशन कमरे में ले आया गया है। वहाँ में जॉनी कार्सन जैसे एक मुस्कुराते, खिचड़ी बालों वाले खिलाड़ीनुमा आदमी से मिलती हूँ । वह मुझसे हाथ मिलाता है, बताता है मेरी बेटी कितनी शानदार है। फिर हम मंच पर होते हैं और आँखों में आँसू भरे डी मुझे बाँहों में ले लेती है। मेरी ड्रेस पर वह ऑर्किड का बड़ा सा फूल टाँक देती है, हालाँकि एक बार मुझे बता चुकी है कि ऑर्किड के फूल उसे निहायत फूहड़ लगते हैं।

असल ज़िन्दगी में मैं मर्दाना हाथों और बड़ी हड्डियों वाली लम्बी-चौड़ी औरत हूँ, सर्दियों में रात को सोते समय फ़्लैनल के नाइट-गाउन पहनती हूँ और दिन में ओवर-ऑल। सुअर को उतनी ही निर्ममता से मार कर साफ़ कर सकती हूँ जितना कोई मर्द। पारा ज़ीरो हो तो भी मेरी चर्बी मुझे गरम रखती है। पूरा दिन घर के बाहर, धुलाई के लिए बर्फ़ तोड़ती, काम कर सकती हूँ। सुअर से निकली भाप छोड़ती कलेजी मिनटों बाद खुली आग में पकते ही खा सकती हूँ। एक बार की सर्दी में मैंने एक बछड़े की आँखों के बीचों-बीच ऐन दिमाग पर घन दे मारा था और रात होने के पहले ही उसका माँस ठण्डा होने के लिए लटका दिया था। लेकिन हाँ, टी.वी. पर यह सब कुछ नहीं दिखता। वहाँ मैं वैसी ही हूँ जैसा मेरी बेटी मुझे देखना चाहेगी। सौ पाउण्ड से भी हल्की, जौ के अनपके चीले जैसी त्वचा, तपती चमकीली रोशनी में चमकते बाल। मेरी तेज़, हाज़िरजवाब ज़ुबान का मुकाबला करने में जॉनी कार्सन को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है।                                                                                                                                                                                                                                                                लेकिन यह भूल है मेरी। जागने के पहले ही मैं जान जाती हूँ। किसने देखा है भला कोई तेज़ ज़ुबान जॉनसन? ऐसी कल्पना भी कौन कर सकता है कि मैं किसी अजनबी गोरे से आँख मिलाऊँगी? मुझे तो लगता है कभी अगर मैंने उनसे बात भी की है तो भागने को एक पैर तो उठा ही रहा सिर भी उसी दिशा में घूमा रहा जो उनसे ज़्यादा से ज़्यादा दूरी पर हो। लेकिन डी। वह तो किसी की भी आँखों में आँखें डाल कर देख सकती है। हिचक उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं।

"कैसी लग रही हूँ, ममा?" मैगी कहती है। गुलाबी स्कर्ट और लाल ब्लाउज़ में लिपटी उसकी दुबली देह सिर्फ़ इतनी भर दिख रही है कि मैं जान जाऊँ कि वह वहाँ है, दरवाज़े के पीछे, लगभग छुपी।

"अहाते में आ जाओ," मैं कहती हूँ।                                                                                                                

आपने कोई अपाहिज जानवर देखा है, शायद कोई कुत्ता, जो ऐसे किसी लापरवाह आदमी से कुचला गया हो जिसके पास गाड़ी खरीदने लायक अमीरी थी और वह दुबक कर चलते हुए ऐसे किसी आदमी के पास पहुँच जाए जो इतना नासमझ हो कि उसके प्रति दयालु हो उठे। मेरी मैगी ठीक उसी तरह चलती है। ठोड़ी छाती पर, नज़रें ज़मीन पर, पाँव घिसटते हुए। जब से आग ने दूसरे मकान को जला कर जमींदोज़ कर दिया है, वह ऐसी ही है।
                       
मैगी के मुकाबले डी उजली है, उसके बाल ज़्यादा सुन्दर, बदन ज़्यादा भरा हुआ है। वह अब एक औरत है, हालाँकि मैं भूल जाती हूँ कभी-कभी। कितना वक्त हुआ उस दूसरे मकान को जले? दस? बारह साल? कभी-कभी अब भी मैं लपटों को सुन सकती हूँ, मुझसे लिपटी मैगी की बाँहों को महसूस कर सकती हूँ, उसके धुँआते बाल, नन्ही-नन्ही काली धज्जियों में शरीर से गिरती पोशाक। लगता था जैसे उसकी आँखें खींच कर या फिर उनमें झलकती लपटों से धधका कर खोल दी गई हों। और डी! उसे मैं मीठे गोंद के पेड़ तले खड़े देखती हूँ जिसमें से खोद-खोद कर वह गोंद निकाला करती थी। मकान के आखिरी मैले धूसर पटरे को, तपी लाल ईंटों की चिमनी को देखते हुए उसके चेहरे पर एकाग्रता का भाव था। तुम नाचती क्यों नहीं राख के चारों ओर, मैंने पूछना चाहा था। इतनी नफ़रत थी डी को उस मकान से।                                                                                                    
मैं सोचा करती थी उसे मैगी से भी नफ़रत है। मगर वह तब की बात है जब तक हमने -मैंने और चर्च ने- स्कूल के लिए उसे ऑगस्टा भेजने लायक पैसे का इन्तज़ाम नहीं कर लिया था। निर्दय भाव से वह हमारे लिए पढ़ा करती, हम दोनों के ऊपर लफ़्फ़ाज़ी, झूठ, दूसरों की आदतें, पूरी-पूरी ज़िन्दगियाँ ठेलती और उसकी आवाज़ के नीचे दबे, हम अबोध फँसे बैठे रहते। मनगढ़न्त की नदी में वह हमें नहलाती, ऐसे बहुत से ज्ञान से हमें जलाती जिसकी हमें ज़रूरत ही नहीं थी। पढ़ने के अपने गम्भीर तरीके से वह हमें खुद से जोड़ लेती लेकिन जिस क्षण हमको लगता अब कुछ समझ में आने ही वाला है, उसी क्षण हम दोनों को वह बेवकूफ़ों की तरह धकेल देती।                                                                                                                                                                          डी को अच्छी चीज़ों की चाहत थी। हाईस्कूल से ग्रैजुएशन पर पहनने के लिए ऑर्गैण्डी की पीली पोशाक, मुझे कभी किसी के दिए गए सूट से उसने अपना जो हरा सूट बनाया था, उसके साथ पहनने के लिए काले पम्प शू। अपनी कोशिशों के आड़े आने वाली हर चीज़ को घूरने में हरा देने के इरादे की पक्की! एक बार में कई-कई मिनटों तक पलकें न झपकाती। कई बार मन होता झकझोर दूँ पर खुद को रोक लेती। सोलह की उमर में अपना अन्दाज़ था उसका और अन्दाज़ किसे कहते हैं, यह वह जानती थी।                                                                  
मुझे कभी तालीम नहीं मिली. दूसरी जमात के बाद ही स्कूल बन्द कर दिया गया था। मत पूछिए क्यों...आज के मुकाबले सन १९२७ में काले लोग सवाल कम ही पूछा करते थे। अब मैगी मेरे लिए कभी-कभी पढ़ती है। खुशी-खुशी, रुक-रुक कर। पढ़ती जाती है मगर ठीक से देख नहीं पाती । जानती है बहुत तेज़ नहीं है वह। खूबसूरती और पैसे की तरह तेज़ी भी उससे किनारा कर गई है। मैगी जॉन टॉमस से शादी करेगी (गम्भीर चेहरे पर काई लगे दाँत) और तब मैं आज़ाद हो जाऊँगी - यहाँ बैठे रहने और खुद को सुनाने के लिए चर्चगीत गाने को, हालाँकि मैं कभी एक अच्छी गायिका नहीं रही, सुर कभी सधे ही नहीं। मर्दों वाले काम बेहतर कर लेती थी। दूध दुहना पसन्द था जब तक कि सन ४९ में एक तरफ़ लात नहीं खा ली। गाय स्वभाव से बहुत शान्त और स्थिर होती है अगर उसको गलत तरीके से दुहने की कोशिश न की जाए।                                                                            

जानबूझ कर मैंने मकान की ओर पीठ कर ली है। इस मकान में भी तीन कमरे हैं, उस मकान की तरह जो जल गया, बस छत टीन की है। वैसी पटाव की छतें बननी अब बन्द हो गई हैं। खिड़कियाँ भी असली नहीं हैं, छेद बने हैं दीवारों में, पानी के जहाज़ में बने गोखों की तरह, न गोल, न चौकोर। उनके दरवाज़ों पर बाहर की तरफ़ से चमड़े की रोक लगी है। ये मकान भी चरागाह में है, दूसरे वाले की तरह। डी जब देखेगी, बेशक इसे गिरा देना चाहेगी। एक बार उसने मुझे लिखा भी था कि रहने के लिए हम जो भी जगह चुनेंगे, वहाँ वह तो आकर मिल लेगी लेकिन अपने दोस्तों को कभी नहीं लाएगी। मैंने और मैगी ने इसके बारे मे सोचा था और मैगी ने पूछा था, "ममा, डी के कब कोई दोस्त थे?"                                                                                                                              
थे कुछ दोस्त, गुलाबी कमीज़ों में चोर-अन्दाज़ लड़के, धुलाई के दिन स्कूल के बाद मंडराते हुए। कभी न हँसने वाली घबराई हुई लड़कियाँ, डी की कायल - बोलने का उसका सलीका, सुन्दर आकृति, जलाकर रख देने वाली उसकी मज़ाक करने की आदत जो हरदम सज्जी मिले पानी में उठते बुलबुलों की तरह फूटती रहती थी। वे पूजते थे उसको। डी उन्हें भी पढ़ कर सुनाया करती थी।                                                                                                                                                                                                                                                            जब उसका जिमी टी के साथ चल रहा था, तब हमें देने के लिए उसके पास ज़्यादा वक्त नहीं था, बल्कि मीनमेख की अपनी सारी कूवत वह उसी पर खर्च कर दिया करती थी। जिमी टी बेवकूफ़ और भड़कीले लोगों के परिवार की एक चिप्पड़ सी लड़की के साथ शादी करने को उड़ गया। डी को मुश्किल से ही खुद को सम्भालने भर का वक्त मिला था।                                                                                                                                                        
जब वह आ जाएगी तो मिल भी लूँगी। लेकिन लो, वे तो आ ही पहुँचे।                                                                    
पाँव घिसटाते हुए मैगी ने भीतर भाग निकलने की कोशिश की मगर मैंने रोका, कहा "वापस आओ," और वह रुक गई, पाँव के अँगूठे से रेत में कुँआ बनाने की कोशिश करने लगी।  

तेज़ धूप में उनको साफ़ देख पाना तो मुश्किल है लेकिन कार से निकली टाँग की पहली झलक से ही मैं जान गई हूँ कि डी है। उसके पाँव सदा से साफ़-सुथरे हैं, जैसे खुद ईश्वर ने खास अन्दाज़ में गढ़ा हो। कार के दूसरी तरफ़ से एक नाटा,गठीला आदमी उतरता है। उसकी खोपड़ी पर फ़ुट भर लम्बे बाल ही बाल हैं, और ठोड़ी पर भी, खच्चर की ऐंठी हुई पूँछ की तरह लटकते हुए। मुझे मैगी की साँस की चिहुँक सुनाई देती है, 'ऊँह' जैसी आवाज़ करती हुई। जैसे सड़क पर पाँव के ऐन सामने साँप की कुलबुलाती दुम का सिरा नज़र आ जाए। 'ऊँह'।    

उसके बाद डी। जमीन तक लम्बी पोशाक। इस गरमी के मौसम में। ऐसी भड़कीली कि आँखों को चोट लगी। इतने नारंगी और पीले रंग कि सूरज की रोशनी को लौटा दें। डी की पोशाक से छूटती गरमी की लहरों से मुझे अपना चेहरा तपता महसूस हुआ। कन्धों तक झूलते कानों के सोने के बुन्दे। लटकते ब्रेसलेट, पोशाक की परतों को काँख से झटकने के लिए डी जब अपनी बाँहें ऊपर उठाती है, तो झनझनाते। लहराती, ढीली-ढाली पोशाक, जैसे-जैसे पास आती है मुझे अच्छी लगने लगती है। मैगी की 'ऊँह' मुझे फिर सुनाई दी। उसकी बहन के बाल! भेड़ की ऊन की तरह सीधे खड़े। रात से काले। दो लम्बी चोटियों में गुंथे सिरे नन्हीं छिपकलियों की तरह गोलाई मे लिपटे कानों के पीछे गुम होते हुए।                                                                                                          

"वा-सु-जो-टी-न-ओ"  डी ने कहा। यह दोपहर के पहले का अभिवादन है, यानी "नींद कैसी रही ?" अपनी पोशाक में वह तैरती सी चली आती लगी। नाटा, गठीला, नाभि तक लम्बे बालों वाला आदमी खुल कर मुस्कुरा रहा है। फिर वह बोला, "अस्सलामालेकुल, माँ और बहन!" मैगी से गले मिलने वह आगे बढ़ा लेकिन मैगी पीछे खिसक गई, बिल्कुल मेरी कुर्सी के पीठ के पीछे तक। वहाँ मुझे उसका काँपना महसूस हुआ और मैंने जब ऊपर देखा तो उसकी ठोड़ी से पसीना टपकता दिखा।                                                                                                          
"उठना मत," डी ने कहा। क्योंकि मैं भारी-भरकम हूँ उठने के लिए मुझे खुद को धकेलना सा पड़ता है। उठने के एकाध सेकेण्ड पहले से ही उठने की कोशिश करती सी दिख जाती हूँ। डी मुड़ी, सैण्डल में उजली एड़ियाँ झलकाती, वापस कार की तरफ़ गई। फिर एक पॉलरॉयड कैमरे के साथ बाहर झाँका। तेज़ी से नीचे झुकी और मकान के सामने बैठी मेरी और मेरे पीछे दुबकी मैगी की तस्वीरों की एक के बाद एक झड़ी लगा दी। फ़ोटो लेने के पहले हर बार वह ठीक से देख लेती कि मकान भी शामिल हो। अहाते के किनारे एक गाय चरती हुई आई तो डी ने मैगी,मकान और मेरे साथ उसकी भी तस्वीर ले ली। फिर पॉलरॉयड को कार की पिछली सीट पर रख कर वह मेरे पास लौटती है, मेरा माथा चूमती है।                                                                                              

इस बीच 'अस्सलामालेकुम' मैगी का हाथ पकड़ कर हिला रहा है। मैगी का हाथ मछली की तरह बेजान और शायद उतना ही ठण्डा है, बावजूद पसीने के, और वह बार-बार उसको वापस खींचने की कोशिश करती रहती है। लगता है 'अस्सलामालेकुम' उसके साथ हाथ मिलाना चाहता है मगर किसी खास नायाब तरीके से या फिर जानता ही नहीं कि लोग हाथ कैसे मिलाते है। जो भी हो जल्द ही वह मैगी से निराश हो जाता है।                          
"तो," मैं कहती हूँ, " डी।"                                                                                                                                
"नही, ममा, डी नहीं, वॉन्जेरो लीवनिका केमान्जो।"                                                                                            
"डी को क्या हुआ?" मैंने जानना चाहा ।

"वह मर चुकी है," वॉन्जेरो ने कहा, "मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कि मेरा नाम उन लोगों के नाम पर रखा जाए जो मुझ पर सितम ढाते आए हैं।"                                                                                                  

"तुम भी उतनी ही अच्छी तरह जानती हो जितना कि मैं कि तुम्हारा नाम डीसी आण्टी के नाम पर रखा गया था।" डीसी मेरी बहन का नाम है, उसी ने डी का नाम रखा था। डी के जन्म के बाद से उसे हम बड़ी डी बुलाने लगे थे। 

"और उनका नाम किसके नाम पर रखा गया था?" वॉन्जेरो ने पूछा।                                                                  

"मेरे खयाल से नानी माँ डी के नाम पर।" मैंने कहा                                                                                          

"और उनका नाम किनके नाम पर?"                                                                                                              

"उनकी माँ," मैंने कहा और देखा वॉन्जेरो ऊब रही है, "लेकिन बस, इतनी ही दूर तक का मैं बता सकती हूँ, इसके पहले का मुझे नहीं मालूम।" हालाँकि दर-अस्ल इसे मैं शायद सिविल वॉर के भी पहले की हर शाखा तक ले जा सकती थी।                                                                                                                                          

"देखा," अस्सलामालेकुम बोला, "वही तो।"                                                                                                      

"ऊँह," मैंने मैगी को कहते सुना।                                                                                                                  

"मैं तो वहाँ थी नहीं," मैंने कहा, "अपने परिवार में डीसी के प्रकट होने के पहले, तो क्यों मैं उतना पहले जाने की कोशिश करूँ?"                                                                                                                                        

वह बस खड़ा-खड़ा मुस्कुराता रहा, मेरी ओर कुछ इस तरह देखते हुए मानो किसी 'ए' मॉडल की कार का मुआयना कर रहा हो। मेरे सर के ऊपर थोड़ी-थोड़ी देर में उसके और वॉन्जेरो के बीच आँखों ही आँखों में इशारे होते रहे। 

"इस नाम का उच्चारण कैसे किया जाता है?"                                                                                                  

"अगर तुम न चाहो तो मुझे इस नाम से बुलाने की कोई ज़रूरत नहीं है।" वॉन्जेरो ने कहा।                                  

"क्यों नहीं? अगर तुम चाहती हो तो हम तुमको इसी नाम से पुकारेंगे।                                                              

"मुझे मालूम है, शुरू में अजीब लगेगा," वॉन्जेरो ने कहा।                                                                                  

"आदत पड़ जाएगी," मैंने कहा, "फिर से बोलो धीरे-धीरे।"                                                                              

खैर, नाम का मसला हमने जल्द ही सुलझा लिया। अस्सलामालेकुम का नाम दुगुना लम्बा और तिगुना कठिन था। जब दो-तीन बार मेरी ज़ुबान लड़खड़ाई तो उसने मुझसे कहा कि मैं उसे सिर्फ़ हाकिमे बार्बर कहकर पुकारूँ, मैंने पूछना चाहा वह क्या बार्बर - हज्जाम - है, लेकिन वाकई मैं ऐसा नहीं समझती थी इसलिए पूछा नहीं।  

"आप सड़क के शुरू में रहने वाले लोगों के यहाँ के होंगे, वही जो माँस के लिए मवेशी पालते हैं।" वे लोग भी मिलने पर 'अस्सलामालेकुम' कहते हैं लेकिन हाथ नहीं मिलाते। हमेशा बहुत व्यस्त - पशुओं को चारा देते, बाड़ की मरम्मत करते, नमक चटाने की ढेरियों के लिए छप्पर डालते, भूसा फैलाते। एक बार जब गोरों ने मवेशियों के झुण्ड में से कुछ को ज़हर दे दिया था तो उनके मर्द हाथ में बन्दूकें लिए सारी रात जागते रहे थे। वह नज़ारा देखने के लिए मैं डेढ़ मील पैदल चली थी।                                                                                                    

हाकिमे बार्बर ने कहा, "उनकी कुछ बातें तो मैं मानता हूँ लेकिन खेती और पशु-पालन मेरा तरीका नहीं है।" (उन दोनों ने बताया नहीं और मैंने पूछा भी नहीं कि वॉन्जेरो (डी) ने क्या वाकई उससे शादी कर ली है।                  

खाने बैठे तो छूटते ही वह बोला कि पत्तेदार सब्ज़ियाँ तो वह खाता नहीं और सुअर का गोश्त दूषित होता है। वहीं वॉन्जेरो कॉर्न-ब्रेड, चिटलिन और हरी सब्ज़ियाँ और बाकी सब कुछ खाती रही और शकरकन्दी के बारे में धड़ल्ले से बोलती रही। हर चीज़ में उसे मज़ा आ रहा था। इसमें भी की हम अब भी वे ही बेन्चें इस्तेमाल कर रहे थे जो कभी उसके डैडी ने बनाई थीं क्योंकि कुर्सियाँ खरीदने को पैसे नही थे।                                                          "

"ओ ममा," वह चीखी फिर हाकिमे बार्बर की तरफ़ मुड़ी, "मुझे मालूम ही नहीं था ये बेन्चें कितनी प्यारी हैं। इन पर पुट्ठों के निशान महसूस किए जा सकते हैं," बेन्च पर अपने नीचे और और साथ की जगह पर हाथ फेरते हुए वह बोली। फिर उसने गहरी साँस ली और उसके हाथ नानी माँ की बटर-डिश पर बँध गए। "यह रही," उसने कहा, "मैं जानती थी कि है एक चीज़ जो अगर माँग सकूँ तो मैं तुमसे माँगना चाहती हूँ।" मेज़ से कूद कर वह उस कोने में गई जहाँ डोल-मथानी रखे थे। डोल में रखा दूध अब तक थक्का बन चुका था। उसने डोल को देखा और देखती रही।                                                                                                                                                  
"मुझे इस डोल का ढक्कन चाहिए," वह बोली, "इसे बड्डी अंकल ने उस पेड़ से तराशा था न जो आप सबका साझे का था?"                                                                                                                                          

"हाँ," मैंने कहा।                                                                                                                                            

"अहा," वह खुश हो कर बोली, "और मुझको पलटा भी चाहिए।"                                                                        
"वह भी बड्डी अंकल ने तराशा था?" बार्बर ने पूछा।                                                                                            
डी (वॉन्जेरो) ने मेरी तरफ़ देखा।                                                                                                                    

"आण्टी डी के पहले पति ने तराशा था," मैगी इतना धीमे से बोली कि मुश्किल से सुनाई दिया, "उनका नाम हेनरी था पर उनको स्टैश बुलाते थे।"                                                                                                                    

"मैगी का दिमाग हाथी जैसा है," हँसते हुए वॉन्जेरो बोली, "डोल के ढक्कन को मैं कोने वाली लम्बी मेज़ पर सजावट के लिए रख सकती हूँ," उसने कहा और डोल के ऊपर एक प्लेट सरका दी, "और इस पलटे का भी मैं कोई न कोई कलात्मक इस्तेमाल खोज ही लूँगी।"                                                                                            

उसने पलटे को लपेटा तो हत्था बाहर निकला रह गया। एक पल को मैंने उसे अपने हाथों में ले लिया। यह नज़र आने के लिए ज़्यादा ध्यान से देखने की ज़रूरत नहीं थी कि मक्खन निकालने के लिए उसे ऊपर-नीचे दबाने वाले हाथों ने उस पर दाब का एक निशान छोड़ दिया है। दर-अस्ल कई सारे छोटे-छोटे निशान, देखा जा सकता था अंगूठे और उंगलियाँ कहाँ-कहाँ लकड़ी पर दबे थे। हल्के पीले रंग की सुन्दर लकड़ी जो बड़ी डी और स्टैश के अहाते में उगे एक पेड़ से निकली थी।        

खाने के बाद डी (वॉन्जेरो) मेरे पलंग के पायताने रखे सन्दूक के पास गई और उसे खखोलने लगी। मैगी रसोई में ही डिशपैन के ऊपर रुकी रही। दो रज़ाइयाँ लिए वॉन्जेरो बाहर निकली। दोनों को नानी माँ डी ने टुकड़ा-टुकड़ा जोड़ा था। फिर बड़ी डी और मैंने चौखटे में कस, सामने के पोर्च में रज़ाइयाँ बनाई थीं। एक रज़ाई 'अकेला सितारा' की शक्ल की थी और दूसरी 'पर्वत के चक्कर' के शक्ल की। दोनों में उन पोशाकों के के टुकड़े थे जो नानी माँ डी ने पचास साल या शायद उसके भी पहले पहनी थीं। और नाना जैरेल की कैरी की छीण्ट वाली कमीज़ों के छोटे-छोटे टुकड़े, और पर-नाना एज़ा की उस वर्दी का एक नन्हा सा नीला, लगभग एक माचिस के बराबर टुकड़ा, जो उन्होंने सिविल वॉर में पहनी थी।                                                                                          
"ममा," वॉन्जेरो बोली, चिड़िया सी मीठी, "क्या मैं ये पुरानी रज़ाइयाँ ले सकती हूँ?"                                                
मैंने सुना रसोई में कुछ गिरा और मिनट भर बाद रसोई का दरवाज़ा धड़ाम से बन्द हो गया।                            

"तुम दूसरी वालियों में से एक-दो क्यों नहीं ले लेतीं?" मैंनें पूछा, "ये पुरानी वाली तो मैंने और बड़ी डी ने कपड़ों के कुछ टुकड़ों को लेकर बना ली थीं जो मरने के पहले तुम्हारी नानी ने जोड़े थे।"                                            

"नहीं," वॉन्जेरो बोली, "वे वाली नहीं चाहिए, उनके बॉर्डर के चारों ओर मशीन की सिलाई है।"                              

"तो वे ज़्यादा दिन चलेंगी," मैंने कहा। 

"बात वो नहीं है," वॉन्जेरो ने कहा, "ये उन पोशाकों के टुकड़े हैं जो नानी माँ पहना करती थीं। ये सारी सिलाई उन्होंने हाथ से की है। सोचो ज़रा।" रज़ाइयों को कस कर पकड़े वह उन पर हाथ फेरती रही।                            

"इनमें से कुछ टुकड़े, जैसे वह लैवेण्डर रंग वाले, उन पुराने कपड़ों के हैं जो उनकी माँ ने उनको दिए थे," मैंने कहा और रज़ाइयों को छूने आगे बढ़ी। डी (वॉन्जेरो) पीछे हट गई, बस इतना ही कि मैं उनको छू न सकूँ। रज़ाइयाँ अभी से उसकी हो चुकीं थीं।

"सोचो भला !" उसने फिर साँस भरी और उन्हें सीने पर कस लिया।                                                                  

"सच तो यह है," मैंने कहा, "मैंने मैगी से वादा किया था कि जब वह जॉन टॉमस से शादी करेगी तो ये रज़ाइयाँ मैं उसको दूँगी।" 

डी ऐसे चिहुँक उठी जैसे मधुमक्खी ने काट खाया हो।                                                                                    

"मैगी को क्या समझ इन रज़ाइयों की!" वह बोली, "वह तो इतनी दकियानूस है कि इनको रोज़ाना इस्तेमाल करने लगेगी।"                                                                                                                                        

"मेरे खयाल से ज़रूर करने लगेगी," मैंने कहा, "ईश्वर जानता है इतने लम्बे अरसे से मैंने इन्हें बिना इस्तेमाल के बचाकर रखा हुआ है। मैं चाहती हूँ वह इस्तेमाल करे।" यह बात मैं उठाना नहीं चाहती थी कि डी जब कॉलेज जा रही थी, एक रज़ाई मैंने उसे देनी चाही थी। तब उसने कहा था, पुराने फ़ैशन की हैं, अब नहीं चलतीं।                                     
"पर ये तो अनमोल हैं!" अब वह कह रही थी, क्रुद्ध, क्योंकि क्रोध उसका स्वभाव है। "मैगी इनको बिस्तर पर रख देगी और पाँच साल में इनके चीथड़े हो जाएँगे। उससे भी कम वक्त में।"                                                            
"तब फिर वह और बना सकती है," मैंने कहा, "मैगी को रज़ाई बनाना आता है।"                                              

डी (वॉन्जेरो) ने हिकारत से मुझे देखा। "आप कभी नहीं समझेंगी। बात इन रज़ाइयों की है, 'इन' रज़ाइयों की।"

अच्छा," कुछ चकरा कर मैंने पूछा, "तुम क्या करोगी इनका?"                                                                          

"टाँगूँगी," वह बोली। मानो रज़ाइयों से बस यही एक काम लिया जा सकता हो।                                    

मैगी तबतक दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई थी। उसके पाँवों की एकदूसरे पर घिसटने से जो आवाज़ निकली, वह मुझे लगभग सुनाई दे गई।                                                                                                          

"उसे ले लेने दो ममा," उसने कहा, किसी ऐसे की तरह जिसे आदत हो कि न कभी कुछ उसे मिलेगा, न कभी कुछ उसके लिए रखा जाएगा। "रज़ाइयों के बिना भी नानी माँ डी मुझे याद रहेंगी।"                                            

मैंने ध्यान से उसे देखा। उसने अपना निचला होंठ वेरी-तम्बाकू से भर रखा था जिसने उसके चेहरे को एक नशेड़ी और गिरी हुई सी शक्ल दे दी थी। उसे नानी माँ डी और बड़ी डी ने खुद रज़ाई बनाना सिखाया था। जले के निशान वाले अपने हाथों को वो अपनी स्कर्ट की परतों में छिपाए खड़ी थी। अपनी बहन को उसने भय जैसे किसी भाव के साथ देखा, नाराज़ी के साथ नहीं। यही भाग्य था मैगी का। वह यही जानती थी कि ईश्वर के काम करने का यही तरीका है।                                                                                                                                              
उसको इस तरह खड़े मैंने देखा, ठक से कोई चीज़ मेरे सर पर लगी और पाँव के तलुओं तक दौड़ गई। ठीक जैसे जब मैं चर्च में होती हूँ और परमात्मा की अनुभूति मुझे स्पर्श करती है और हर्ष से मैं चीख उठती हूँ। मैंने ऐसा कुछ किया जैसा पहले कभी नही किया था : मैगी को बाँहों में समेटा, घसीट कर कमरे तक ले गई, मिस वॉन्जेरो के हाथ से रज़ाई झटकी और मैगी की गोद में पटक दी।                                                                        
"बाकी में से एक या दो ले लो," मैंने डी से कहा।                                                                                                                                                                                                                                                                    पर वह मुड़ी और बिना एक शब्द बोले बाहर हाकिमे बार्बर के पास चली गई।                                                    
"तुम बिल्कुल कुछ नहीं समझतीं," मैं और मैग़ी जब बाहर कार तक गए, उसने कहा।                                        

"क्या नहीं समझती?" मैंने जानना चाहा।                                                                                                        

"अपनी धरोहर," वह बोली। फिर मैगी की ओर मुड़ी, उसे चूमा और कहा, " तुम्हें चाहिए कि कोशिश करो, कुछ बनो मैगी। हमारे लिए सच ही नया दिन उगा है, पर तुम और ममा जिस तरह रह रहे हो, तुम्हें कभी पता ही नहीं चलेगा।"                                                                                                                                                        
उसने धूप का चश्मा लगाया जिसने नाक की नोक और ठोड़ी के ऊपर सब ढक लिया।                           

मैगी मुस्कुराई, शायद धूप के चश्मे पर। लेकिन असली मुस्कान। भयभीत नहीं। कार की धूल को जब बैठते देख लिया तो मैंने मैगी से कहा मेरे लिए चुटकी भर तम्बाकू ले आए। और फिर हम दोनों वहीँ बैठे रहे, मगन-मन, जब तक कि घर जा कर सोने का वक्त नहीं हो गया।                                                                                                                     
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1 comment:

  1. पूरे वातावरण का सजीव चित्रण है। खूबसूरत अनुवाद। आपको बधाई।

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